यात्रामा वासस्थानबाट हिंड्दा पढ्ने मन्त्र
"गच्छ गौतम शीघ्रत्वं ग्रामेषु नगरेषु च। आसनं भोजनं शैय्यां स्थानं मे परिकल्पय:॥'
दिन र रात्रि बारबेला प्रयोग गर्ने तरिका
कुनैपनि दिनको दिनमानलाई ८ ले भाग गर्ने र आएको घडी पला एउटा बार बेलाको एउटा समय हुने गर्दछ। त्यसपछि अर्को बेलालाई क्रमश: जोड गर्दै जाने त्यही समय हुने गर्दछ। उदाहरणको लागि: आश्विन २१ गते सोमबारको दिनमान २९ घडी ०५ पला छ। यसलाई ८ ले भाग गर्दा ३ घडी ३८ पला भयो बजेमा १ घण्टा २७ मिनेट भयो। त्यसैले सोमबारको पहिलो बारबेला अमृत हो तसर्थ सूर्योदयको प्रथम ३ घडी ३८ पला अर्थात् बजेमा १ घण्टा २७ मिनेट सूर्योदय समयका जोड गर्ने त्यतिबेलासम्म अमृतबेला भयो। त्यसपछि क्रमश: अन्य बेलाहरु जोड गर्दै जानुपर्छ। तर कतिपय विद्वान्हरुले दिनमानलाई हिसाबै नगरी ३ घडी ४५ पलाको हिसाबले जोड गर्दै जाने गरेको पाइन्छ।
दिन बारबेला चक्र
सूर्योदयबाट तल दिएको घडि/पल्ला वा घण्टा/मिनेट जोड्ने
| घडि/पल्ला | ३।४५ | ७।३० | ११।१५ | १५।० | १८।४५ | २२।३० | २६।१५ | ३०।०० |
| घण्टा/मिनेट | १:३० | ३:०० | ४:३० | ६:०० | ७:३० | ९:०० | १०:३० | १२:०० |
| आइतबार | उद्वेग | चर | लाभ | अमृत | काल | शुभ | रोग | उद्वेग |
| सोमबार | अमृत | काल | शुभ | रोग | उद्वेग | चर | लाभ | अमृत |
| मंगलबार | रोग | उद्वेग | चर | लाभ | अमृत | काल | शुभ | रोग |
| बुधबार | लाभ | अमृत | काल | शुभ | रोग | उद्वेग | चर | लाभ |
| बिहीबार | शुभ | रोग | उद्वेग | चर | लाभ | अमृत | काल | शुभ |
| शुक्रबार | चर | लाभ | अमृत | काल | शुभ | रोग | उद्वेग | चर |
| शनिबार | काल | शुभ | रोग | उद्वेग | चर | लाभ | अमृत | काल |
रात्रि बारबेला चक्र
सूर्यास्तबाट तल दिएको घडि/पल्ला वा घण्टा/मिनेट जोड्ने
| घडि/पल्ला | ३।४५ | ७।३० | ११।१५ | १५।० | १८।४५ | २२।३० | २६।१५ | ३०।०० |
| घण्टा/मिनेट | १:३० | ३:०० | ४:३० | ६:०० | ७:३० | ९:०० | १०:३० | १२:०० |
| आइतबार | शुभ | अमृत | चर | रोग | काल | लाभ | उद्वेग | शुभ |
| सोमबार | चर | रोग | काल | लाभ | उद्वेग | शुभ | अमृत | चर |
| मंगलबार | काल | लाभ | उद्वेग | शुभ | अमृत | चर | रोग | काल |
| बुधबार | उद्वेग | शुभ | अमृत | चर | रोग | काल | लाभ | उद्वेग |
| बिहीबार | अमृत | चर | रोग | काल | लाभ | उद्वेग | शुभ | अमृत |
| शुक्रबार | रोग | काल | लाभ | उद्वेग | शुभ | अमृत | चर | रोग |
| शनिबार | लाभ | उद्वेग | शुभ | अमृत | चर | रोग | काल | लाभ |
राहुकालको जानकारी
राहुकाल हिन्दू ज्योतिषमा महत्त्वपूर्ण अवधारणा हो। यो यस्तो समय अवधि हो जसमा शुभ कार्यहरू गर्नबाट बच्नुपर्छ किनभने यसलाई अशुभ र बाधक मानिन्छ। राहुकालको गणना सूर्योदय र सूर्यास्तको आधारमा गरिन्छ र यो दैनिक रूपमा परिवर्तन हुन्छ। राहुकालको समय विभिन्न दिनका घण्टाहरूमा विभाजित गरिन्छ र यसको सही समय स्थान र दिनको आधारमा परिवर्तन हुन्छ। सामान्यतया, यो एक घण्टा र तीस मिनेटको अवधि हुन्छ।
यहाँ विभिन्न दिनहरूमा राहुकालको समयको सामान्य तालिका दिइएको छ
कुनैपनि दिनको दिनमानलाई ८ ले भाग गर्ने र आएको घडी पला एउटा बार बेलाको एउटा समय हुने गर्दछ। बारदिनको कतिऔँ खण्ड राहुकाल हुन्छ?
आइतबार ८ औँ खण्ड, सोमबार २ औँ खण्ड, मंगलबार ७ औँ खण्ड, बुधबार ५ औँ खण्ड, बिहीबार ६ औँ खण्ड, शुक्रबार ४ औँ खण्ड, शनिबार ३ औँ खण्डमा राहुकाल पर्दछ।
| बार | समय | देखि | सम्म |
| आइतबार | साँझ | ४:३० | ६:०० |
| सोमबार | बिहान | ७:३० | ९:०० |
| मंगलवार | दिउँसो | ३:०० | ४:३० |
| बुधबार | मध्यान्ह | १२:०० | १:३० |
| बिहीबार | दिउँसो | १:३० | ३:०० |
| शुक्रबार | बिहान | १०:३० | १२:०० |
| शनिबार | बिहान | ९:०० | १०:३० |
कालराहु दिशा ज्ञान
आइतबार कालराहु उत्तर दिशामा, सोमबार वायव्य दिशामा, मंगलबारमा पश्चिम दिशामा, बुधबार नैर्ऋत्य दिशामा, विहीबार दक्षिण दिशामा, शुक्रबार आग्नेय दिशामा, शनिबार पूर्वदिशामा कालराहु रहन्छन्। कालराहुलाई पृष्ठ वा बाँया पारेर यात्रा गर्नुपर्छ। सम्मुख र दाहिने परेमा अशुभ वा मरणाशन्न कष्ट हुन्छ। यात्रामा कालराहुलाई विशेष विचार गर्नुपर्छ।
शुक्र का विचार तथा फल
दैत्येज्यो ह्यभिमुखदक्षिणे यदि स्याद्, गच्छेयुर्न हि शिशुगर्भिणीनवोढा:। बालश्चेत् व्रजति विपद्यते नवोढा:, चेद्वन्ध्या भवति च गर्भिणी त्वगर्भा॥
द्विरागमन (नयाँ दुलही माइतबाट घर फर्कने समय) मा यदि शुक्र अगाडि (सम्मुख) वा दायाँ (दक्षिण) पर्यो भने नवविवाहित, गर्भवती र बच्चा भएकी स्त्री आफ्नो पतिको घर जानु हुँदैन। यदि पतिको घर गएमा बच्चा भएकी स्त्रीको बच्चा मर्छ, गर्भवतीको गर्भपतन हुन्छ र नवविवाहित स्त्री बाँझो हुन्छिन्।
घाततिथि
गोस्त्रीझषे घाततिथिस्तु पूर्णा भद्रा नृयुक्कर्कटकेऽथ नन्दा। कौर्ष्याजयोर्नक्रघटे च रिक्ता जया धनु:कुम्भहरौ न शस्ता:॥
घातवार
नक्रे भौमो गोहरिस्त्रीषु मन्दश्चन्द्रो द्वन्द्वेऽर्कोऽजभे ज्ञश्च कर्के। शुक्र: कोदण्डालिमीनेषु कुम्भे जूके जीवो घातवारा न शस्ता:॥
| घातर चक्र | |||||||
| राशि | मेष | मिथुन | मकर | कर्कट | तुला र कुम्भ | वृश्चिक, धनु र मीन | वृष, सिंह र कन्या |
| घातक बार | आइतबार | सोमबार | मङ्गलबार | बुधबार | बिहीबार | शुक्रबार | शनिबार |
घात नक्षत्र
मघाकरस्वातिमैत्रमूलश्रुत्यम्बुपान्त्यभम्। याम्यब्राह्मेशसार्पञ्च मेषादेर्घातभं न सत्॥
| घात नक्षत्र चक्र | |||||||||||||
| राशि | मेष | वृष | मिथुन | कर्कट | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन | |
| घात नक्षत्र | मघा | हस्त | स्वाती | अनुराधा | मूल | श्रवण | शतभिषा | रेवती | भरणी | रोहिणी | आर्द्रा | अश्लेषा | |
योगिनी विचार
नवभूम्य: शिववह्नयोऽक्षविश्वेऽर्ककृता: शक्ररसास्तुरङ्गतिथ्य:। द्विदिशोऽमावसवश्च पूर्वत: स्युस्तिथय: सम्मुखवामग: न शस्ता:॥
योगिनीवास चक्र
| ८।३० ई. | १।९ पू. | ३।११ आ. |
| २।१० उ. | योगिनी वास | ५।१३ द. |
| ७।१५ वा. | ६।१४ प. | ४।१२ नै. |
घातलग्न
भूमि (१) द्वय (२) ब्ध्य (४) द्रि (७) दिक् (१०) सूर्य्या (१२)
ङ्गा (६) ष्टा (८) ङ्के (९) शा (११) ग्नि (३) सायका: (५)
मेषादिघातलग्नानि यात्रायां वर्जयेत्सुधी:॥
| घातलग्न चक्र | ||||||||||||
| राशि | मेष | वृष | मिथुन | कर्कट | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन |
| घातलग्न | मेष | वृष | कर्कट | तुला | मकर | मिथुन | कन्या | वृश्चिक | धनु | कुम्भ | मिथुन | सिंह |
सर्वदिग यात्रा
मैत्रार्कपुष्याश्विनभैर्निरुक्ता यात्रा शुभा सर्वदिशासु तज्ज्ञै:।
अनुराधा, हस्त, अश्विनी र पुष्य यी चार नक्षत्रहरूमा सबै दिशाको यात्रा शुभ मानिन्छ। अर्थात्, यी नक्षत्रहरूमा यात्रा गर्दा परिघ दण्ड उल्लंघन, पृष्ठ चन्द्र र दिक्शूल जस्ता दोषहरू लाग्दैनन्।
सम्मुख शुक्रको अपवाद
यावच्चन्द्र: पूषभात्कृत्तिकाद्ये पादे शुक्रोऽन्धो न दुष्टोऽग्रदक्षे।
जबसम्म शुक्र रेवती, अश्विनी, भरणी र कृत्तिकाको प्रथम चरणमा रहन्छ, तबसम्म उनी 'अन्ध' (अन्धो) हुन्छन्। त्यसैले, त्यस समयमा सम्मुख (अगाडि) वा दक्षिण (दायाँ) भागमा शुक्र भए पनि त्यसको दोष लाग्दैन।
त्रिनवमी दोष
प्रवेशान्निर्गमं तस्मात् प्रवेशं नवमे तिथौ। नक्षत्रे च तथा वारे नैव कुर्यात् कदाचन॥
नगर वा गाउँमा प्रवेश गरेको दिनदेखि नवौँ नक्षत्र, नवमी तिथि र नवौँ बारमा पुन: यात्रा गर्नु हुँदैन। त्यसैगरी, यात्रा सुरु गरेको दिनदेखि नवौँ तिथि, नवौँ नक्षत्र वा नवौँ बारमा गन्तव्य स्थानमा प्रवेश कदापि गर्नु हुँदैन।
रवि आदि वारदोहद
रसालां पायसं काञ्जीं शृतं दुग्धं तथा दधि। योऽमृतं तिलान्नञ्च भक्षयेद्वारदोहदम्॥
यात्राका लागि अशुभ बार पर्यो भने अत्यावश्यक कामका लागि यी वस्तु सेवन गरेर यात्रा शुभ हुन्छ।
दिक्शूल ज्ञान
शनिं चंद्र त्यजेत्पूर्वा दक्षिणां च दिशं गुरौ। सूर्ये शुक्रे, पश्चिमां च बुधे भौमे तथोत्तराम्॥
यात्रामा सम्मुखादि शुक्रको फल
दक्षिणे दुखद: शुक्र: संमुखे हंति लोचनम् वाम पृष्ठे शुभोनित्यं रोधयेच्चास्तग: शुभम्॥
चन्द्रवास (कुन राशिमा चन्द्रमा कुन दिशामा रहन्छन्)
चन्द्रश्चरतिपूर्वादि क्रमेण दिक्चतुष्टयम्। मेषादिकेषु यात्रायां दक्षिणे सम्मुखे शुभ:॥
मेषे च सिहे धनु पूर्वभागे, वृषे च कन्या मकरे च याम्ये। यग्मे तुला कुम्भसु पश्चिमायां कर्कालिमीन दिशिचोत्तरस्याम्॥
सम्मुख चन्द्रमाको फल
संमुखे अर्थलाभाय पृष्ठेचन्द्रे धनक्षय:। दक्षिणे सुखसंपत्तिर्वामे तु मरणं भवेत्॥
यात्रामा तिथिको विचार
मासस्य प्रतिपद् श्रेष्ठा द्वितीया कामकारिणी। आरोग्यदा तृतीया च चतुर्थी कलहप्रदा॥
पंचमी च श्रियायुक्ता षष्ठी कलहकारिणी। भक्षपान समायुक्ता सप्तमी सुखदा सदा॥
अष्टमीव्याधिदा नित्यं नवमी मृत्युदास्मृता। दशमी भूरिलाभास्याच्चैकादश्यां च हेमदा॥
द्वादशी प्राणसंदेहा सर्वसिद्धा त्रयोदशी। शुक्ला वा यदि वा कृष्णावर्जनीया चतुर्दशी॥
पौर्णिमायाममायां च प्रस्थानं नैव कारयेत्। तिथिक्षये च मासांते ग्रहणांते दिनत्रयम्॥
यात्रामा तिथिको विचार प्रतिपदा श्रेष्ठ, द्वितीय कामकारिणी, तृतीया आरोग्यदायकं, चतुर्थी कलहप्रद, पञ्चमी श्रीप्रद, षष्ठी कलहप्रिय, सप्तमी सुखप्रद, अष्टमी व्याधिप्रद, नवमी मृत्युप्रद, दशमी लाभप्रद, एकादशी स्वर्गप्रद, द्वादशी प्राणसंदेह, त्रयोदशी सर्वसिद्धिदात्री छ तथा चतुर्दशी, पूर्णिमा र औँसी तिथि क्षय ग्रहणको तीन दिन यात्रामा वर्जित छ।
योगिनीवास विचार
प्रतिपत्सु नवम्यां च पूर्वस्यां दिशि योगिनी। अग्निकोणे तृतीयायामेकादश्यां तु सास्मृता॥
त्रयोदश्यां च पंचम्यां दक्षिणस्यां शिवप्रिया। द्वादश्यां च चतुर्थ्यां च नैर्ऋत्येकोणगामिनी॥
चतुर्दर्थ्यां च षष्ठ्यां च पश्चिमायां च योगिनी पूर्णिमायां च सप्तम्यां वायुकोणे तु पार्वती॥
दशम्यां च द्वितीयायामुत्तरस्यां शिवा वसेत्। ईशान्यां दर्श चाष्टम्यां योगिनी समुदाहृता॥
योगिनी सुखदा वामे पृष्ठे वांछितदायिनी। दक्षिणे धनहन्त्री च सम्मुखे मरणप्रदा॥
सर्वदिग्गमन नक्षत्र
सर्वदिग्गमने हस्त: पूषाश्वौ श्रवणो मृग:। सर्वसिद्धिकर: पुष्यो विद्यायां च गुरुर्यथा॥
हस्त, रेवती, अश्विनी, श्रवण, मृगशिरा, पुष्य यी नक्षत्र समस्त दिशाका यात्रामा शुभ हुन्छ।
घरदेखि निस्किँदाको साईत
घर वा बसेको ठाउँ छोडी अन्यत्र जानलाई यात्रा भनिन्छ।
द्विग्द्वारी नक्षत्र
मृ.ति.ह.श्र सबै समयमा अश्वि.ति. ह. अनु. सबै दिशालाई शुभ छन्।
शुक्र बिचार
सम्मुखे दक्षिणे शुक्रे नो गच्छेत्तु कदाचन। गर्भिणीस्तु विगर्भास्यान्नवोढा वन्ध्यतामियात्॥
स्त्रीहरूले यात्रा गर्दा सम्मुख वा दाहिने शुक्र पार्नुहुँदैन।
तत्परिहार: “रेवत्यादि मृगान्तेच यावत्तिष्ठति चन्द्रमा। तावदन्धो भवेत्शुक्र: सम्मुखे दक्षिणे शुभ:॥
"सम्मुख वा दाहिने शुक्रको दोष नलाग्ने दिन-रेवतीदेखि मृगशिरा नक्षत्रसम्म चन्द्रमा हुँदा शुक्र अन्ध हुन्छ, सम्मुख वा दाहिने शुक्रको दोष लाग्दैन। शुक्र अस्त भएमा पनि दोष छैन।
यात्राबाट निवृत्त भएर गृहप्रवेश गर्दा
नवम दिन-वर्ष-मास ४, ६, ८, ९, १२, १४ तिथि छोडी अनु.चि.मू. ३ उत्तरा, रे. रो. यति नक्षत्रमा प्रवेश गर्नु शुभ हुन्छ।
विशेष- नवम दिन- वर्ष-मासमा प्रवेश गर्नै पर्ने भएमा रात परेपछि घरको प्रमुख व्यक्तिले आगन्तुकलाई बोलाएर प्रवेश गराउने चलन छ।
यात्रामा शुभ शकुन
ब्राह्मण, कन्या, भरिएको जलपात्र, दही, माछा, गाई, बाँधेको पशु, फूल, फल, रत्न, बाजा बजेको, सन्तानयुक्त महिला, चराको बोली. वेदमंन्त्र, मन्दिरको घण्टनाद आदि।
यात्रामा अशुभ शकुन
पतिता-सन्तानहीन-विधवा-गर्भीणी- रजस्वला-सुत्केरी महिला, जोगी, हिजडा, विष्टा, तेल, गडेउलो सर्प आदि सरिसृप, गधाको आवाज, खाली बा जुठा भाँडा, विरामी -विकल-नग्न- पागल-कपाल खौरेको मानिस, रित्तो गाग्री वा घडा, बिरालोले बाटो काटेको, कुकुर वा बिरालाको झगडा, उल्टो, जुत्ता-चप्पल, भिजेको, कपडा, हाच्छ्युँ आएको आदि।
विशेष- यात्रा गर्दा अपशकुन देखिएमा पहिला चोटी उभिएर ११ पटक, दोस्रो चोटी १६ पटक प्राणायाम गरी हिँड्ने, तेस्रा चोटी पनि अपशकुन भएमा यात्रा नगर्ने।
अत्यावश्यक वा पराधिनतामा शकुन र तिथि, नक्षत्र आदि विचार गर्न सम्भव हुँदैन अत: मनमा उत्साह लिएर भगवान्को स्मरण गरी यात्रा गर्नु योग्य छ।
मङ्गलं भगवान् विष्णु: मङ्गलं गरुडध्वज:। मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरि:॥